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Kaamwali Ko Choda

कामवाली को चोदा

हाय दोस्तों मेरा नाम मनीषा हे और में उड़ीसा के एक छोटे से सहर से हूँ दोस्तों पहले तो में अपने बारे में सब कुछ बता दू मेरे घर में में और मेरी माँ हम दो ही लोगो का परिवार हे मेरी माँ मेरे लिए सब कुछ हे मेरी माने मेरे पापा के गुजर जाने के बाद बड़ी मुस्किलो से बड़ा किया हे तो अब जब मेरी माँ बीमार हे तो में उसे केसे इसे ही छोड़ देती.

दोस्तों फिलहाल मेरी उम्र १९ साल हे और में १२ तक पढ़ी हूँ मेरी माँ घर घर जाके काम करती थी और हम दोनों का गुजरान चलता था जबसे माँ बीमार हे उसकी दवाई के पेसे तो ठीक घर में दो वक़्त की रोटी के भी लाले पड़ने लगे तो इसे में मेने माँ को मन लिया और में खुद ही वो जहा जहा काम करती थी वह में खुद ही काम करने जाने लगी.
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भाभी की जोरदार चुदाई

मेरी भाभी अपेक्षा जो लगभग ३२ साल की है और दो बच्चों की माँ है, रंग गोरा, शरीर भरा हुआ, न एकदम दुबला न एक दम मोटा-ताज़ा। मतलब बिल्कुल गज़ब की। पर चूचियाँ तो दो-दो किलो के और गाँड कुछ ज़्यादा ही बाहर निकले हैं। मेरे ख़्याल से उसकी फिगर ३८-३२-३९ होगी।
मैं उस भाभी को चोदने के चक्कर में दो सालों से लगा था, और उसके नाम से मूठ मारा करता था। मेरे भैया (४०), जो ग्वालियर में ही रहते थे, रेडीमेड कपड़ों के धंधे में थे और अपना माल दिल्ली ख़ुद ही जाकर लेकर आते थे।
एक दिन जब मैं अपने घर पहुँचा तो भैया वहाँ थे, और मम्मी से बातें कर रहे थे। मैंने भैया से पूछा – “अब नये कपड़े कब आ रहे हैं?”
“बस आज ही लाने जा रहा हूँ। पर इस बार माल दिल्ली से नहीं, मुम्बई से लेकर आना है। वहाँ एक नामी कम्पनी से मेरी बात तय हो गई है। मुझे वहाँ से आने में चार-पाँच दिन तो लग ही जाएँगे। तब तक मैं चाहता हूँ कि तुम दिन में एक बार ज़रा दुकान जाकर काम देख लेना और रात में मेरे घर चले जाना।”
“तू अपेक्षा और बच्चों को यहीं क्यों नहीं छोड़ देता?” मेरी मम्मी ने पूछा।
“मैंने अपेक्षा से कहा था कि बच्चों के साथ दीदी के यहाँ रह लेना, पर वह कह रही थी कि चार-पाँच दिनों के लिए आप लोगों को क्यों परेशान करना, बस नन्द को बोल देना, वो तुम्हारे आने तक हमारे यहाँ ही आ जाए और दुकान को भी काम देख ले। नौकरों के भरोसे दुकान छोड़ना ठीक नहीं। तुझे कोई दिक्क़त तो नहीं?” – भैया बोले।
“अभी तो मैं पूरा खाली ही हूँ। परीक्षाएँ भी खत्म हो चुकी हैं। चलिए एक अनुभव के लिए आपकी दुकान को भी सँभाल लेते हैं (और भाभी को भी)।”
“आज ८ बजे मेरी ट्रेन है, तू सात बजे घर आ जाना और मुझे स्टेशन छोड़ कर वापिस मेरे घर ही चले जाना।”
“ठीक है मैं ६:३० बजे आ जाऊँगा।”
६:३० बजे मैं भैया के घर पहुँच गया, भैया सफ़र की तैयारी कर रहे थे और भाभी पैकिंग में भैया की मदद कर रही थी। पैकिंग के बाद भाभी ने भैया को खाना दिया और मुझे भी खाने के लिए पूछा।
“भैया को छोड़कर आता हूँ, फिर खा लूँगा।” मैंने कहा।
७:३० बजे भैया और मैं स्टेशन पहुँच गए। भैया की ट्रेन सही समय पर आ गई, भैया का आरक्षण था, भैया अपनी सीट पर जाकर बैठ गए और पाँच मिनट के बाद ट्रेन मुम्बई के लिए चल पड़ी। चलते-चलते भैया बोले,”भाभी और बच्चों का ख्याल रखना।”
“आप यहाँ की फिक्र ना करें, मैं भाभी और बच्चों का पूरा ख्याल रखूँगा।”
मैंने स्टैण्ड से अपनी बाईक ली और ८:३० तक घर आ गया। मैंने दरवाज़े की कॉलबेल बजाई तो भाभी ने दरवाज़ा खोला और बोली,”हाथ-मुँह धो लो, अब हम खाना खा लेते हैं।”
“आपने अभी तक काना नहीं खाया?” मैंने पूछा।
“बस तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रही थी। अनु और मोनू तो खाना खाकर सो गए हैं। तुम भी खाना खा लो।”
मैं और भाभी डिनर की टेबल पर एक-दूसरे के आमने-सामने बैठ कर खाना खा रहे थे। जब भाभी निवाला खाने के लिए थोड़ा झुकती उनकी चूचियों की गहराईयों के दर्शन होने लगते और मेरा लंड विचलित होने लगता। पर स्वयं को सँभाल कर मैंने खाना खतम किया और टीवी चालू कर लिया। उस समय आई पी एल मैच चल रहे थे, मैं मैच देखने लगा।
कुछ देर बाद भाभी बर्तन साफ करने लगी और वह भी मैच देखने लगी। जल्दी ही उसे नींद आने लगी। “मैं तो सोने जा रही हूँ, तुम भी हमारे कमरे में ही सो जाना, तुम डबल बेड में बच्चों के एक तरफ ही सो जाना” भाभी बोली।
“ठीक है, बस एक घन्टे में मैच खत्म होने वाला है। आप सो जाओ, मैं मैच देखकर आता हूँ।”
भाभी चली गई और मैं मैच देखने लगा।
कुछ देर बाद बाद ब्रेक हुआ और मैं चैनल बदलने लगा, और एक लोकल चैनल पर रुक गया। डिश वाले एक ब्लू-फिल्म प्रसारित कर रहे थे। अब काहे का मैच, मैं तो उसी चैनल पर रुक गया और वो ब्लू-फिल्म देखने लगा और मेरा लंड हिचकोले मारने लगा।
मेरा साढ़े पाँच इंच का लंड लोहे की तरह सख्त होकर तन गया, मैं अपनी पैंट के ऊपर से ही उसे सहलाने लगा। मेरा लंड चूत के लिए फड़फड़ाने लगा और मेरी आँखों के सामने भाभी का नंगा बदन घूमने लगा और मैं भाभी के नाम से मूठ मारने लगा। मैं मन ही मन भाभी को चोद रहा था, कुछ देर बाद लंड ने एक पिचकारी छोड़ दी। मेरा वीर्य लगभग पाँच फीट दूर छिटका, और यह बस भाभी के नाम का कमाल था।
अब मेरा दिमाग भाभी को हर हाल में चोदने के बारे में सोचने लगा, तब तक फिल्म भी खत्म हो गई थी। मैंने टीवी बन्द किया और बेडरूम की ओर चल दिया। जैसे ही मैंने कमरे की बत्ती जलाई, मेरी आँखें फटी रह गईं। बिल्लू और मोनू, दोनों दीवार की ओर सो रहे थे, और भाभी बीच बिस्तर में। उनकी साड़ी घुटनों के ऊपर तक उठ गई थी और उनकी गोरी-गोरी जाँघें दिख रहीं थीं। उनका पल्लू बिखरा हुआ था, ब्लाउज़ के ऊपर के दो हुक खुले थे और काली ब्रा साफ-साफ दिख रही थी। भाभी एकदम बेसुध सो रहीं थीं।
मैंने तुरन्त लाईट बन्द की और अपने लंड को सहलाते हुए सोचा,’क़िस्मत ने साथ दिया तो समझ हो गया तुम्हारा जुगाड़ !’
मैं जाकर भाभी के पास लेट गया, भाभी एकदम गहरी नींद में थी। मैंने एक हाथ भाभी के गले पर रख दिया और हाथ को नीचे खिसकाने लगा। अब मेरा हाथ ब्लाउज़ के हुक तक पहुँच गया। मैं आहिस्ते-आहिस्ते हुक खोलने लगा। तभी भाभी बच्चों की ओर पलट गई, इससे मुझे हुक खोलने में और भी आसानी हो गई और मैंने सारे हुक खोल दिए। ब्रा के ऊपर से ही भाभी की चूचियों को सहलाने लगा।
भाभी के स्तन एकदम मुलायम थे। पर ब्रा ने उन्हें ज़ोरों से दबा रखा था, इस कारण ऊपर पकड़ नहीं बन रही थी। मैं अपना हाथ भाभी की ब्लाउज़ के पीछे ले गया और ब्रा के हुक को भी खोल दिया। अब दोनों स्तन एकदम स्वतंत्र थे। मैं उन आज़ाद हो चुके बड़े-बड़े स्तनों को हल्के-हल्के सहलाने लगा, फिर मैं एक हाथ उनकी जाँघ पर ले गया और ऊपर की ओर ले जाने लगा पर एक डर सा भी लग रहा था कि कहीं भाभी जाग ना जाए। पर जिसके लंड में आग लगी हो वो हर रिस्क के लिए तैयार रहता है और लंड की आग को सिर्फ चूत का पानी ही बुझा सकता है।
हिम्मत करके मैं अपने हाथ को ऊपर ले जाने लगा। जैसे-जैसे मेरा हाथ चूत के पास जा रहा था, मेरा लंड और तेज़ हिचकोले मार रहा था।
अब मेरा हाथ भाभी की पैन्टी तक जा पहुँचा था। पैन्टी के ऊपर से ही मैंने हाथ चूत के ऊपर रख दिया। चूत बहुत गीली थी और भट्टी की तरह तप रही थी। मैंने साड़ी को ऊपर कर दिया और पैन्टी को नीचे खिसकाने लगा। थोड़ी मेहनत के बाद मैं पैन्टी को टाँगों से अलग करने में कामयाब रहा।
अब मैं हाथ को चूत के ऊपर ले गया और चूत को प्यार से सहलाने लगा। भाभी अभी तक शायद गहरी नींद में थी। मैंने एक हाथ भाभी की कमर पर रखा और उन्हें सीधा करने लगा।
भाभी एक ही झटके से सीधी हो गई। मैं अपनी टाँग को भाभी की टाँगों के बीच ले गया और भाभी की टाँगों को फैला दिया। अब मैं नीचे खिसकने लगा और मैं जैसे ही चूत चाटने के लिए मुँह चूत के पास ले गया, भाभी ने हाथ से चूत को ढँक लिया।
मेरी तो गाँड फट गई, रॉड की तरह तना हुआ लौड़ा एकदम मुरझा गया, दिल धाड़-धाड़ धड़कने लगला।
तभी भाभी उठी और फुसफुसाकर बोली,”ये सब यहाँ नहीं। अनु और मोनू जाग सकते हैं। अब तक तो मैंने किसी तरह अपनी सिसकियाँ रोक रखीं थीं पर अब नहीं रोक सकूँगी। हम ड्राईंगरूम में चलते हैं।”
इतना सुनते ही मेरा लंड फिर से क़ुतुबमीनार बन गया। भाभी जैसे ही बिस्तर पर से उठी, मैंने भाभी को अपनी बाँहों में भर लिया और उनके होंठों को चूमने लगा। वह भी मेरे होंठों पर टूट पड़ी। हम एक-दूसरे के होंठों को पागलों की तरह निचोड़ने लगे।
मैं उनके होंठों को चूमते हुए अपने दोनों हाथ उनकी गांड तक ले गया और उन्हें उठा लिया। भाभी ने अपने पैर मेरी कमर के गिर्द लपेट दिए। मैं उन्हें चूमते हुए ड्राईंगरूम तक ले आया और भाभी को लेकर सोफे पर बैठ गया।
भाभी मेरी गोद में थी, ब्लाउज़ और ब्रा अभी भी भाभी के कंधों से लटक रहे थे। पहले मैंने ब्लाउज़ को निकाल फेंका, फिर ब्रा और एक चूची को हाथ से मसलने लगा और साथ ही दूसरी चूची को चाटने लगा।
अब साड़ी की बारी थी, मैंने साड़ी भी निकाल फेंकी, अब पेटीकोट बेचारे का भी शरीर पर क्या काम था। अब भाभी एकदम नंगी हो चुकी थी। लाल नाईट-बल्ब की रोशनी में भाभी का नंगा बदन पूर्णिमा में ताज़ की तरह चमक रहा था और इस वक्त मैं इस ताजमहल का मालिक था।
अब भाभी मेरे कपड़े उतारने लगी। मेरे सारे कपड़े उन्होंने उतार दिए और मैं सिर्फ अपनी फ्रेंची अण्डरवियर में रह गया पर वह भी अधिक देर न रह सका। उन्होंने वह भी एक ही झटके में उतार फेंकी और फिर भाभी ने मेरे साढ़े पाँच इंच लम्बे विकराल लंड को लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी।
कभी भाभी लंड पर, तो कभी अंडकोष से सुपाड़े तक जीभ फिराती, कभी लंड को हल्के से काटती, सुपाड़े पर थूकती और फिर उसे चाट जाती। मेरा तो बुरा हाल कर दिया और मेरे लंड ने भाभी के मुँह पर अपनी पिचकारी मार दी। उनका पूरा चेहरा मेरे वीर्य से सन गया था। मैंने अपने दोनों हाथों से सारा वीर्य उनके चेहरे पर मल दिया।
“दूसरी बार में भी इतना माल? तेरा लंड है या वीर्य का टैंक?” – भाभी ने कहा।
मैं यह सुनकर हैरान हो गया, मेरी हैरानी जानकर उन्होंने बताया – “जब तू ब्लू-फिल्म देख रहा था और मेरे नाम से मूठ मार रहा था तब मैं पानी पीने के लिए रसोईघर में आई थी और तेरे लंड की धार को देख कर मेरी कामवासना की प्यास जाग गई और मैं बेडरूम में अपने कपड़ों को जान-बूझ कर अस्त-व्यस्त कर लेट गई थी। वहाँ आने के बाद अगर तू ऐसी हरकतें नहीं करता तो आज मैं ही तेरा बलात्कार कर देती।”
“तरबूज़ तलवार पर गिरे या तलवार तरबूज़ पर, कटना तरबूज़ को ही है। अब तो आज रात सचमुच में बलात्कार होगा। आज रात अगर आपसे रहम की भीख न मँगवाई तो मेरा भी नाम नन्द नहीं।” मैंने कहा।
“चल देखते हैं, कौन रहम की भीख माँगता है !” भाभी ने भी ताना सा मारा।
भाभी के ऐसा कहते ही मैंने भाभी को ज़मीन पर लिटा दिया और उनकी चूत पर टूट पड़ा, अपनी जीभ को चूत में जितना हो सकता था अन्दर डाल दिया और जीभ हिलाने लगा। चूत के गुलाबी दाने को जैसे ही मैं हल्के-हल्के काटता-चूसता, वह तड़प उठती और आआहहहहहह आआहह्ह्हहहह करने लगती।
उसने टाँगों से मेरे सिर को जकड़ लिया और टाँगों से ही सिर को चूत में दबाने लगी और बालों में हाथ फेरने लगी। मैं चूत-अमृत पीते हुए दोनों स्तनों को मसल रहा था… तभी अचानक भाभी का शरीर अकड़ने लगा उनकी चूत ज़ोरदार तरीके से झड़ने लगी।
मैंने चूत को चाटकर साफ कर दिया और जैसे ही मैं भाभी के ऊपर आने को हुआ, भाभी ने मुझे रोका और गेस्ट-रूम की ओर इशारा किया। मैं समझ गया कि वह उस कमरे में चलने को कह रही है। मैंने उन्हें गोद में लिया और चूमते हुए उस कमरे में ले आया। लाईट जलाई तो देखा, वहाँ एक सिंगल बेड था। मैंने पंखा चालू किया और उन्हें बिस्तर पर पटक दिया और उनके ऊपर आ गया। मैंने उनके होंठों को चूमते हुए अपनी टाँगों से उनकी टाँगे चौड़ी कीं।
अब मेरा लंड भाभी की चूत के ऊपर था। मैंने अपने हाथों को सीधा किया और धक्के मारने की मुद्रा में आ गया। अब मैं अपनी कमर को नीचे करता और लंड को चूत से स्पर्श करते ही ऊपर कर लेता। कुछ देर ऐसा करने के बाद भाभी बोली,”अब मत तड़पाओ, मेरी चूत में आग लग रही है, इसमें अपना लंड अब डाल दो और मेरी चूत की आग को शान्त करो, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ।
इस बार मैंने लण्ड चूत पर रखा और धीरे-धीरे नीचे होने लगा और लण्ड चूत की गहराईयों में समाने लगा। चूत बिल्कुल गीली थी, एक ही बार में लण्ड जड़ तक चूत में समा गया और हमारी झाँटे आपस में मिल गईं। अब मेरे झटके शुरु हो गए और भाभी की सिसकियाँ भी… भाभी आआआहहहहह अअआआआआहहहह करने लगी। कमरा उनकी सिसकियों से गूँज रहा था।
जब मेरा लण्ड उनकी चूत में जाता तो फच्च-फच्च और फक्क-फक्क की आवाज़ होती। मेरा लण्ड पूरा निकलता और एक ही झटके मे चूत में पूरा समा जाता। भाभी भी गाँड हिला-हिला कर मेरा पूरा साथ दे रही थी। मैंने झटकों की रफ्तार बढ़ा दी, अब तो खाट भी चरमराने लगी थी। पर मेरी गति बढ़ती जा रही थी। हम दोनों पसीने से नहा रहे थे। पंखे के चलने का कोई भी प्रभाव नहीं था।
दोनों के चेहरे एकदम लाल हो रहे थे पर हम रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। झटके अनवरत जारी थे। कभी मैं भाभी के ऊपर तो कभी भाभी मेरे ऊपर आ जाती। दोनों ही चुदाई का भरपूर मज़ा ले रहे थे। पूरे कमरे में बस कामदेव का राज था। हम दोनों एक-दूसरे की आग को बुझा रहे थे। तभी हमारे शरीर अकड़ने लगे।
दोनों झड़ने वाले थे। मैं लण्ड को बाहर निकालने वाला ही था कि भाभी ने रोक दिया और बोली – “अपना सारा माल चूत के अन्दर ही छोड़ दो।”
मैंने भी झटके चालू रखे। हम दोनों ने एक-दूसरे को भींच लिया। भाभी ने टाँगों और हाथों को मेरे शरीर पर लपेट दिया। मैंने भाभी के कंधों को कसकर पकड़ लिया और एक ज़ोरदार झटका मारा। मैं और भाभी एक ही साथ झड़े थे। भाभी की चूत मेरे वीर्य से भर गई।
वीर्य चूत से बह रहा था। मेरा मुँह अपने-आप चूत पर पहुँच गया और मैं भाभी की चूत को चाट-चाट कर साफ करने लगा।
भाभी ने भी मेरे लंड को चूस-चूस कर साफ कर दिया और हम दोनों एक-दूसरे के बगल में लेट गए, पर भाभी का हाथ मेरे लंड पर था और मैं भाभी के बालों को सहला रहा था।
भैया के आने तक मैं और भाभी पति-पत्नी की तरह रहे। मैं सुबह को दुकान का एक चक्कर लगा आता। दिन में हम नींद ले लेते और रात को…
भैया के आने के बाद भी जब भी मौक़ा मिलता, मैं उसको छोड़ता नहीं।

नौकरी करनी है? चूत को चोदना पड़ेगा।

एक शहर में एक सेठ रहता था। चूंकि वो काफी रईस था तो उसने शादियाँ भी चार की थी। उस सेठ की उम्र करीब 64-65 रही होगी। अब आप सोच सकते हैं कि इस उम्र के आदमियों का लण्ड क्या खड़ा होता होगा। उसके घर में हर काम के लिये अलग-अलग नौकर लगे हुए थे। उसकी तीन पत्नियां का तो ठीक-ठाक था क्योंकि उन्होंने सेठ से भरपूर मजा लिया था पर चौथी पत्नी की हालत खराब थी क्योंकि उसकी उम्र २५-२७ रही होगी और इस उम्र में उसे किसी भी प्रकार का मजा नहीं मिल पा रहा था।
आखिर उसने तंग आकर ऐसा फैसला किया कि आप सबके होश उड़ जाएंगे।
उसका नाम तारा था, उसकी एक नौकरानी थी जिसका नाम कृतिका था।
अपनी जवानी से तंग आकर एक दिन तारा ने कृतिका से कहा- अब नहीं रहा जाता ! मैं तो अब नौकरों से अपनी चूत चुदवाकर अपनी जवानी की प्यास को ठण्डी करूँगी !
कृतिका चौंक गई यह सुनकर !
वो बोली- आप किससे चुदवाएंगी ?
तारा ने कहा- तू मेरा साथ दे तो हम दोनों को भरपूर मजा मिल सकता है !
कृतिका भी एक नंबर की चुदक्कड़ थी और सेठ से तो कई बार चुदवा चुकी थी। वो तुरंत तैयार हो गई। फिर तारा ने अशोक और मनोज नाम के नौकरों को चुना और कृतिका से उन दोनों को बुलवाया। कृतिका उन दोनों नौकरों को बुलाकर तारा के पास ले आई। वे दोनों नौकर काफी गरीब थे और सेठ के यहां दो वक्त की रोटी के लिये जी-तोड़ मेहनत करते थे। वे दोनों तारा के सामने किसी मुजरिम की तरह खड़े हो गये।
तारा ने उन दोनों को ऊपर से नीचे तक गौर से देखा और कृतिका से कहा- वाह क्या हट्‌टे कट्‌टे हैं ये दोनों !
फिर उसने नौकरों से कहा- तुम दोनों को मेरा एक काम करना होगा !
नौकरों ने डरते-डरते पूछा- क्या काम है मालकिन ?
तारा ने कहा- तुम्हें हमारी चूत को चोद कर फाड़ना पड़ेगा।
उन दोनों नौकरों के तो होश ही उड़ गए। दोनों की जबान से आवाज नहीं निकल रही थी। फिर उन दोनों ने हिम्मत करके पूछा- आप हमारी परीक्षा क्यों ले रहीं हैं मालकिन ?
तो तारा ने गुस्सा होकर कहा- मादरचोदो ! अगर नौकरी करनी है तो हमारा यह काम करना पड़ेगा, नहीं तो जाओ तुम्हारी आज से छुट्‌टी।
अब उन दोनों के आगे कोई दूसरा चारा नहीं था। तो उन दोनों ने तारा से पूछा- हमें करना क्या है?
तब तारा ने कृतिका से कहा- दरवाजा बंद कर दे !
कृतिका ने जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया।
फ़िर तारा ने कहा- अब तुम दोनों अपने अपने कपड़े उतार कर मेरे पास आओ।
उन्होंने ऐसा ही किया और एकदम नंगे होकर तारा के सामने खड़े हो गए। तारा ने उन दोनों का लंड देखा तो उसकी बांछें खिल गई। उसने जल्दी से अशोक का लंड अपने हाथ में लिया और मुठ मारने लगी। मनोज के लंड को अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगी।
कुछ देर लंड चूसने के बाद वो बिस्तर पर चित्त लेट गई और उन दोनों को भी बिस्तर पर आने का न्यौता दिया। दोनों बिस्तर पर लेट गए। कृतिका भी नंगी होकर अपनी चूत में उंगली डालकर मजे ले रही थी।
फिर तारा ने दोनों से कहा- मेरी एक-एक चूची दोनों बांट लो और उसे मसल डालो, चाट डालो, चूस डालो।
दोनों ने ऐसा ही किया। करीब १० मिनट चूची की चुसाई के बाद तारा ने कहा- अशोक ! मेरी सलवार उतारो !
अशोक ने सलवार का नाड़ा खोलकर उसे नीचे खिसकाया। आधा खिसकते ही तारा ने उसे रोक दिया और कहा- अभी इतना ही ! बाकी कुछ देर के बाद !
फिर से अशोक ने तारा की चूची चूसना शुरू कर दिया।
तारा ने कृतिका से कहा- क्या अपनी चूत को उंगली से चोद रही है ! इधर आ और मेरी चूत को चाट !
कृतिका दौड़कर आई और तारा की चूत को चाटने लगी। कुछ देर के बाद तारा ने उसे रोक दिया और कहा- पूरा माल तू ही चाट लेगी तो ये दोनो बेचारे क्या मुठ मार कर रहेंगे? तू हट और इन दोनों को चाटने दे।
फिर अशोक को इशारे से तारा ने चूत चाटने को कहा। अशोक जल्दी से चूत चाटने के लिये नीचे खिसक गया। उसकी तो आज जिंदगी बन गई। तारा जैसी औरत की चूत जो रसगुल्ले की तरह थी उसे वो चाटने लगा। तारा मदहोश होने लगी। फिर उसने मनोज को भी मौका दिया। वो भी जल्दी से नीचे गया और चूत चाटने लगा। तारा की चूत से नमकीन पानी गिरने लगा जो मनोज गटगटा कर पी गया। इधर कृतिका तारा की चूची को चूसती जा रही थी। कुछ देर के बाद तारा ने कहा- बस, अब मेरी सलवार पूरी उतारो।
दोनों ने ऐसा ही किया- उसे पूरी तरह से नंगी कर दिया।
फिर तारा ने कहा- मनोज अब तुम मेरी चूत को चोद कर उसका भरता बना दो !
मनोज ने आव देखा न ताव, अपना लंड तारा की चूत के दीवाल पर लगाकर ऐसा धक्का मारा कि पूरा का पूरा लंड एक ही बार में तारा की चूत को ककड़ी की तरह चीरता हुआ समा गया। तारा का बदन ऐंठने लगा। फिर तुरंत अशोक तारा की एक चूची और कृतिका भी एक चूची चूसने लगी, जिससे उसे कुछ राहत मिली।
तारा थोड़ी देर के बाद जोश में आ गई और नीचे से चूतड़ उछालने लगी। मनोज ने भी अपनी रफ़्तार बढ़ा दी और तारा की चूत में ताबड़तोड़ धक्के मारने लगा। कुछ देर के बाद तारा ने मनोज को नीचे आने के लिये कहा और मनोज नीचे चित्त लेट गया।
फिर तारा मनोज के ऊपर चढ़ गई और उसके लंड को अपनी चूत में डाल लिया और खुद धक्के मारने लगी।
फिर थोड़ी देर में उसने अशोक को कहा- तुम पीछे से मेरी गांड में अपना लंड डालो।
अशोक के लंड में कृतिका ने खूब तेल लगा दिया और फिर अशोक ने तारा की गांड की छेद में लंड को रखकर एक करारा धक्का मारा। तारा के मुंह से चीख निकल गई लेकिन थोड़ी ही देर में सब शांत हो गया और उन दोनों ने धक्कों की रफ़्तार बढा दी।
करीब २० मिनट के बाद तारा ऐंठने लगी और चिल्लाने लगी- चोदो मुझे ! फाड़ दो मेरी गांड और चूत ! मैं तुम दोनों को मालामाल कर दूंगी ! चोदो मादरचोदो ! चोदो मुझे ! आ .. .. … …. ….. हा …………. और ………… तेज चोदो।
फिर कुछ ही देर में वो झड़ गई लेकिन अशोक और मनोज उसे चोदते रहे और वो चुदवाती रही। कुछ देर के बाद उन दोनों ने भी अपना अपना माल उसकी चूत और गांड में उड़ेल दिया। फिर उस रात बारी बारी से कई बार उन दोनों ने तारा और कृतिका को चोदा।

ट्रेन में चुदाई देवरानी-जेठानी की

यह सत्य घटना है चूँकि मैं सेल्स प्रोफेशन से हूँ, कई बार जल्दी में बिना रिजरवेशन के भी यात्रा करनी पड़ती है।
इसी तरह मुझे ठंड के दिनों में कटनी जाना था, मैं सारनाथ एक्सप्रेस ट्रेन के जनरल कोच में बैठ गया। मेरे बाजू में दो औरतें बैठी थी। ट्रेन चलने के थोड़ी ही देर बाद मुझे नींद आने लगी। नींद में मेरी कोहनी बगल में बैठी औरत की छाती से टकराने लगी। कुछ देर बाद उसने मुझे अपने से दूर कर दिया जिससे मेरी नींद खुल गई पर मुझे समझ आ गया कि उसे कुछ मजा आ रहा है। मैं फिर नींद का बहाना कर जानबूझ कर उसकी छाती को अपनी कोहनी से दबाने लगा।
उसे धीरे-धीरे मजा आने लगा था और मेरी हिम्मत भी बढ़ने लगी थी। चूँकि ठंड के दिन थे अतः वो शाल ओढ़े हुई थी। मैंने धीरे से अपना हाथ बढ़ा कर उसके छाती को दबाया वो भी नींद का बहाना करने लगी थी पर मुझे समझ आ रहा था कि वो भी मजे लेना चाह रही है।
मैं अपने हाथ से धीरे धीरे उसके स्तनों को उसकी शाल के अंदर दबाने लगा था। उसकी हल्की हल्की सिसकारियाँ निकलने लगी थी। उसने मुझे इशारा किया कि लाइट जल रही है, कोई देख सकता है। मैंने उसकी शाल से हाथ बाहर निकाल लिया।
थोड़ी देर बाद मैं पेशाब जाने के बहाने उठा वापिस आकर मैं बोला- लाइट बंद कर दो, नींद नहीं आ रही है।
तो लाइट बंद हो गई। चूँकि ठंड के दिन थे इसलिए खिड़कियाँ भी बंद थी इससे उधर अँधेरा हो गया और मुझे आजादी मिल गई। मैने तुरंत उसकी शाल में हाथ डालकर उसके स्तनों को जोर जोर से दबाना चालू कर दिया जिससे उसकी सिसकारियाँ निकलने लगी। फिर मैने उसके ब्लॉउज के हुक खोल दिए और उसकी ब्रा खोल दी।
वाह क्या मस्त स्तन थे ! बिल्कुल सुडौल ! कोई भी औरत ऐसे स्तन पाकर किसी भी मर्द को अपने वश में कर सकती है !
मैं उसके स्तनों को जोर जोर से चूसने लगा, वो बेकाबू होती जा रही थी, उसने मेरा लंड पकड़ लिया था और जोर जोर से उसे मसलने लगी थी।
फ़िर मैं उसकी साड़ी उठा कर उसकी पैंटी पर हाथ रगड़ने लगा। उसकी पैंटी पूरी गीली हो चुकी थी। मैंने उसे उठा कर उसकी पैंटी को उतार दिया उसने मेरी पैंट की ज़िप खोल कर मेरा लंड बाहर निकाल लिया और आगे पीछे करने लगी।
मेरी भी हालत खराब होने लगी थी। मैं उसका एक दूध पी रहा था और दूसरा स्तन मसल रहा था। मेरा दूसरा हाथ उसकी चूत को मसल रहा था। मेरे दोनों हाथ में माल था और मुँह उसका दूध पीने में व्यस्त था।
उसकी सिसकारियाँ सुनकर और उसके इतने हिलने डुलने से दूसरी औरत जो उसकी जेठानी थी, अँधेरे में देखने की कोशिश करने लगी कि क्या हो रहा है। उसने महसूस किया कि उसकी देवरानी मुझसे चुदने की कोशिश कर रही है।
उसने अपनी देवरानी को पकड़ा और धीमे से उससे पूछने लगी।
उसने धीमे से बता दिया कि मैं क्या कर रहा हूँ.। तो वो बीच में आकर मुझे पूछने लगी और कहने लगी कि वो शोर मचा कर सबको बता देगी।
उसकी देवरानी की जान निकल गई, वो उसको बोलने लगी- जीजी ! ये आपको भी चोद देंगे ! इन्हें कुछ मत कहो ! मुझे बहुत समय बाद इतना मजा आ रहा है, आपको मालूम है कि मेरे पति मेरी आग नहीं बुझा पाते हैं और इसका लंड भी बड़ा है।
तो वो मान गई।
मैंने कहा- मैं पहले इसको शांत कर लूँ, फिर तुम्हारी बारी आयेगी।
तो वो बोली- चोदोगे कैसे ? यहाँ तो बहुत भीड़ है और जगह भी नहीं है?
मैंने कहा- मैं कर लूँगा ! बस जैसा मैं कहूँ, वैसा करती जाओ !
तो वो तैयार हो गई। अब चूँकि कोई दिक्कत नहीं थी अत: हमने थोड़ी स्थिति बदली, जेठानी कोने में आ गई और देवरानी उसकी गोद में लेट गई। मैं खिडकी की तरफ आ गया और उसके ऊपर लेट कर उसके स्तन चूसने लगा।
धीरे धीरे मैं 69 अवस्था में आकर उसकी चूत चाटने लगा और वो मेरा लंड चूसने लगी। ऐसा लगता था कि उसको लंड चूसने में महारथ हासिल थी। उसके इतने जोर से चूसने से मैं एकदम से उसके मुँह में ही झड़ गया। वो मेरा पूरा वीर्य पी गई। लंड चुसवाने में मुझे इतना मजा कभी नहीं आया था !
वो एक बार पहले ही झड चुकी थी थोड़ी ही देर में वो दूसरी बार भी झड़ गई। मेरा लंड बिल्कुल निढाल पड़ा हुआ था। थोड़ी देर हम ऐसे ही लेटे रहे।
कुछ देर बाद जब हम सामान्य हुए तो मैंने उसे बाथरूम चलने को कहा। थोड़ी ना-नुकुर के बाद वो मान गई।
मैने उसे कहा- अपनी शाल लेकर चलना।
मुझे मालूम था कि बाथरूम पूरा सूखा है। मैंने बाथरूम बंद कर नीचे शाल बिछाई और उसको लेटा दिया और उसका ब्लाउज खोल दिया और उसके स्तनों को दबाने और चूसने लगा। उसके मुँह से जोर-जोर से आवाज निकलने लगी- मुझे जोर से चोदो ! मैं बरसों से प्यासी हूँ ! मेरी प्यास मिटा दो !
थोड़ी देर बाद मैने अपना लंड निकाला और उसकी चूत से लगा दिया। उसकी चूत इतनी गीली थी कि मेरा लंड उसकी चूत में जड़ तक समा गया। उसने जोर से सिसकारी भरी और मुझे अपनी बांहों में जकड़ लिया। मैने तेजी से धक्के मारना चालू कर दिया। हर धक्के पर उसकी सिसकारियाँ तेज होती जा रही थी। करीब सौ-सवा सौ धक्कों के बाद एकदम से उसका बदन थरथराया और उसने मुझे तेजी से अपनी बांहों में समेट लिया। वो झड़ चुकी थी, एकदम से मेरा भी वीर्य छूटा और उसकी चूत को सराबोर कर दिया।
हम दोनों पूर्णरूप से तृप्त हो चुके थे। उसने मुझे बाद में बताया उसकी शादी को दो साल हो चुके है पर उसके पति ने उसे कभी भी संतुष्ट नहीं किया है। आज पहली बार उसने सेक्स का पूरा आनंद लिया है। और वो मेरी बहुत आभारी है।
उसने मुझे अपना मोबाईल नंबर भी दिया और कहा कि जब भी मैं उसके शहर में आऊंगा, वो मुझसे मिलने जरूर आएगी।
यह मेरा ट्रेन में पहली बार सेक्स का अनुभव था जिसने मुझे बहुत आनंदित किया। थोड़ी देर बाद मैने उसकी जेठानी के साथ भी सेक्स किया। उसकी जेठानी उससे भी बड़ी चुदक्कड निकली जिसने मेरे लंड को पूरा निचोड़ दिया। मुझे ऐसा लग रहा था कि मैं दो-तीन दिन तक किसी भी लड़की को नहीं चोद पाऊँगा।

भाभी और मेरा लंड

मेरी भाभी अपेक्षा जो लगभग ३२ साल की है और दो बच्चों की माँ है, रंग गोरा, शरीर भरा हुआ, न एकदम दुबला न एक दम मोटा-ताज़ा। मतलब बिल्कुल गज़ब की। पर चूचियाँ तो दो-दो किलो के और गाँड कुछ ज़्यादा ही बाहर निकले हैं। मेरे ख़्याल से उसकी फिगर ३८-३२-३९ होगी।
मैं उस भाभी को चोदने के चक्कर में दो सालों से लगा था, और उसके नाम से मूठ मारा करता था। मेरे भैया (४०), जो ग्वालियर में ही रहते थे, रेडीमेड कपड़ों के धंधे में थे और अपना माल दिल्ली ख़ुद ही जाकर लेकर आते थे।
एक दिन जब मैं अपने घर पहुँचा तो भैया वहाँ थे, और मम्मी से बातें कर रहे थे। मैंने भैया से पूछा – “अब नये कपड़े कब आ रहे हैं?”
“बस आज ही लाने जा रहा हूँ। पर इस बार माल दिल्ली से नहीं, मुम्बई से लेकर आना है। वहाँ एक नामी कम्पनी से मेरी बात तय हो गई है। मुझे वहाँ से आने में चार-पाँच दिन तो लग ही जाएँगे। तब तक मैं चाहता हूँ कि तुम दिन में एक बार ज़रा दुकान जाकर काम देख लेना और रात में मेरे घर चले जाना।”
“तू अपेक्षा और बच्चों को यहीं क्यों नहीं छोड़ देता?” मेरी मम्मी ने पूछा।
“मैंने अपेक्षा से कहा था कि बच्चों के साथ दीदी के यहाँ रह लेना, पर वह कह रही थी कि चार-पाँच दिनों के लिए आप लोगों को क्यों परेशान करना, बस नन्द को बोल देना, वो तुम्हारे आने तक हमारे यहाँ ही आ जाए और दुकान को भी काम देख ले। नौकरों के भरोसे दुकान छोड़ना ठीक नहीं। तुझे कोई दिक्क़त तो नहीं?” – भैया बोले।
“अभी तो मैं पूरा खाली ही हूँ। परीक्षाएँ भी खत्म हो चुकी हैं। चलिए एक अनुभव के लिए आपकी दुकान को भी सँभाल लेते हैं (और भाभी को भी)।”
“आज ८ बजे मेरी ट्रेन है, तू सात बजे घर आ जाना और मुझे स्टेशन छोड़ कर वापिस मेरे घर ही चले जाना।”
“ठीक है मैं ६:३० बजे आ जाऊँगा।”
६:३० बजे मैं भैया के घर पहुँच गया, भैया सफ़र की तैयारी कर रहे थे और भाभी पैकिंग में भैया की मदद कर रही थी। पैकिंग के बाद भाभी ने भैया को खाना दिया और मुझे भी खाने के लिए पूछा।
“भैया को छोड़कर आता हूँ, फिर खा लूँगा।” मैंने कहा।
७:३० बजे भैया और मैं स्टेशन पहुँच गए। भैया की ट्रेन सही समय पर आ गई, भैया का आरक्षण था, भैया अपनी सीट पर जाकर बैठ गए और पाँच मिनट के बाद ट्रेन मुम्बई के लिए चल पड़ी। चलते-चलते भैया बोले,”भाभी और बच्चों का ख्याल रखना।”
“आप यहाँ की फिक्र ना करें, मैं भाभी और बच्चों का पूरा ख्याल रखूँगा।”
मैंने स्टैण्ड से अपनी बाईक ली और ८:३० तक घर आ गया। मैंने दरवाज़े की कॉलबेल बजाई तो भाभी ने दरवाज़ा खोला और बोली,”हाथ-मुँह धो लो, अब हम खाना खा लेते हैं।”
“आपने अभी तक काना नहीं खाया?” मैंने पूछा।
“बस तुम्हारा ही इन्तज़ार कर रही थी। अनु और मोनू तो खाना खाकर सो गए हैं। तुम भी खाना खा लो।”
मैं और भाभी डिनर की टेबल पर एक-दूसरे के आमने-सामने बैठ कर खाना खा रहे थे। जब भाभी निवाला खाने के लिए थोड़ा झुकती उनकी चूचियों की गहराईयों के दर्शन होने लगते और मेरा लंड विचलित होने लगता। पर स्वयं को सँभाल कर मैंने खाना खतम किया और टीवी चालू कर लिया। उस समय आई पी एल मैच चल रहे थे, मैं मैच देखने लगा।
कुछ देर बाद भाभी बर्तन साफ करने लगी और वह भी मैच देखने लगी। जल्दी ही उसे नींद आने लगी। “मैं तो सोने जा रही हूँ, तुम भी हमारे कमरे में ही सो जाना, तुम डबल बेड में बच्चों के एक तरफ ही सो जाना” भाभी बोली।
“ठीक है, बस एक घन्टे में मैच खत्म होने वाला है। आप सो जाओ, मैं मैच देखकर आता हूँ।”
भाभी चली गई और मैं मैच देखने लगा।
कुछ देर बाद बाद ब्रेक हुआ और मैं चैनल बदलने लगा, और एक लोकल चैनल पर रुक गया। डिश वाले एक ब्लू-फिल्म प्रसारित कर रहे थे। अब काहे का मैच, मैं तो उसी चैनल पर रुक गया और वो ब्लू-फिल्म देखने लगा और मेरा लंड हिचकोले मारने लगा।
मेरा साढ़े पाँच इंच का लंड लोहे की तरह सख्त होकर तन गया, मैं अपनी पैंट के ऊपर से ही उसे सहलाने लगा। मेरा लंड चूत के लिए फड़फड़ाने लगा और मेरी आँखों के सामने भाभी का नंगा बदन घूमने लगा और मैं भाभी के नाम से मूठ मारने लगा। मैं मन ही मन भाभी को चोद रहा था, कुछ देर बाद लंड ने एक पिचकारी छोड़ दी। मेरा वीर्य लगभग पाँच फीट दूर छिटका, और यह बस भाभी के नाम का कमाल था।
अब मेरा दिमाग भाभी को हर हाल में चोदने के बारे में सोचने लगा, तब तक फिल्म भी खत्म हो गई थी। मैंने टीवी बन्द किया और बेडरूम की ओर चल दिया। जैसे ही मैंने कमरे की बत्ती जलाई, मेरी आँखें फटी रह गईं। बिल्लू और मोनू, दोनों दीवार की ओर सो रहे थे, और भाभी बीच बिस्तर में। उनकी साड़ी घुटनों के ऊपर तक उठ गई थी और उनकी गोरी-गोरी जाँघें दिख रहीं थीं। उनका पल्लू बिखरा हुआ था, ब्लाउज़ के ऊपर के दो हुक खुले थे और काली ब्रा साफ-साफ दिख रही थी। भाभी एकदम बेसुध सो रहीं थीं।
मैंने तुरन्त लाईट बन्द की और अपने लंड को सहलाते हुए सोचा,’क़िस्मत ने साथ दिया तो समझ हो गया तुम्हारा जुगाड़ !’
मैं जाकर भाभी के पास लेट गया, भाभी एकदम गहरी नींद में थी। मैंने एक हाथ भाभी के गले पर रख दिया और हाथ को नीचे खिसकाने लगा। अब मेरा हाथ ब्लाउज़ के हुक तक पहुँच गया। मैं आहिस्ते-आहिस्ते हुक खोलने लगा। तभी भाभी बच्चों की ओर पलट गई, इससे मुझे हुक खोलने में और भी आसानी हो गई और मैंने सारे हुक खोल दिए। ब्रा के ऊपर से ही भाभी की चूचियों को सहलाने लगा।
भाभी के स्तन एकदम मुलायम थे। पर ब्रा ने उन्हें ज़ोरों से दबा रखा था, इस कारण ऊपर पकड़ नहीं बन रही थी। मैं अपना हाथ भाभी की ब्लाउज़ के पीछे ले गया और ब्रा के हुक को भी खोल दिया। अब दोनों स्तन एकदम स्वतंत्र थे। मैं उन आज़ाद हो चुके बड़े-बड़े स्तनों को हल्के-हल्के सहलाने लगा, फिर मैं एक हाथ उनकी जाँघ पर ले गया और ऊपर की ओर ले जाने लगा पर एक डर सा भी लग रहा था कि कहीं भाभी जाग ना जाए। पर जिसके लंड में आग लगी हो वो हर रिस्क के लिए तैयार रहता है और लंड की आग को सिर्फ चूत का पानी ही बुझा सकता है।
हिम्मत करके मैं अपने हाथ को ऊपर ले जाने लगा। जैसे-जैसे मेरा हाथ चूत के पास जा रहा था, मेरा लंड और तेज़ हिचकोले मार रहा था।
अब मेरा हाथ भाभी की पैन्टी तक जा पहुँचा था। पैन्टी के ऊपर से ही मैंने हाथ चूत के ऊपर रख दिया। चूत बहुत गीली थी और भट्टी की तरह तप रही थी। मैंने साड़ी को ऊपर कर दिया और पैन्टी को नीचे खिसकाने लगा। थोड़ी मेहनत के बाद मैं पैन्टी को टाँगों से अलग करने में कामयाब रहा।
अब मैं हाथ को चूत के ऊपर ले गया और चूत को प्यार से सहलाने लगा। भाभी अभी तक शायद गहरी नींद में थी। मैंने एक हाथ भाभी की कमर पर रखा और उन्हें सीधा करने लगा।
भाभी एक ही झटके से सीधी हो गई। मैं अपनी टाँग को भाभी की टाँगों के बीच ले गया और भाभी की टाँगों को फैला दिया। अब मैं नीचे खिसकने लगा और मैं जैसे ही चूत चाटने के लिए मुँह चूत के पास ले गया, भाभी ने हाथ से चूत को ढँक लिया।
मेरी तो गाँड फट गई, रॉड की तरह तना हुआ लौड़ा एकदम मुरझा गया, दिल धाड़-धाड़ धड़कने लगला।
तभी भाभी उठी और फुसफुसाकर बोली,”ये सब यहाँ नहीं। अनु और मोनू जाग सकते हैं। अब तक तो मैंने किसी तरह अपनी सिसकियाँ रोक रखीं थीं पर अब नहीं रोक सकूँगी। हम ड्राईंगरूम में चलते हैं।”
इतना सुनते ही मेरा लंड फिर से क़ुतुबमीनार बन गया। भाभी जैसे ही बिस्तर पर से उठी, मैंने भाभी को अपनी बाँहों में भर लिया और उनके होंठों को चूमने लगा। वह भी मेरे होंठों पर टूट पड़ी। हम एक-दूसरे के होंठों को पागलों की तरह निचोड़ने लगे।
मैं उनके होंठों को चूमते हुए अपने दोनों हाथ उनकी गांड तक ले गया और उन्हें उठा लिया। भाभी ने अपने पैर मेरी कमर के गिर्द लपेट दिए। मैं उन्हें चूमते हुए ड्राईंगरूम तक ले आया और भाभी को लेकर सोफे पर बैठ गया।
भाभी मेरी गोद में थी, ब्लाउज़ और ब्रा अभी भी भाभी के कंधों से लटक रहे थे। पहले मैंने ब्लाउज़ को निकाल फेंका, फिर ब्रा और एक चूची को हाथ से मसलने लगा और साथ ही दूसरी चूची को चाटने लगा।
अब साड़ी की बारी थी, मैंने साड़ी भी निकाल फेंकी, अब पेटीकोट बेचारे का भी शरीर पर क्या काम था। अब भाभी एकदम नंगी हो चुकी थी। लाल नाईट-बल्ब की रोशनी में भाभी का नंगा बदन पूर्णिमा में ताज़ की तरह चमक रहा था और इस वक्त मैं इस ताजमहल का मालिक था।
अब भाभी मेरे कपड़े उतारने लगी। मेरे सारे कपड़े उन्होंने उतार दिए और मैं सिर्फ अपनी फ्रेंची अण्डरवियर में रह गया पर वह भी अधिक देर न रह सका। उन्होंने वह भी एक ही झटके में उतार फेंकी और फिर भाभी ने मेरे साढ़े पाँच इंच लम्बे विकराल लंड को लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी।
कभी भाभी लंड पर, तो कभी अंडकोष से सुपाड़े तक जीभ फिराती, कभी लंड को हल्के से काटती, सुपाड़े पर थूकती और फिर उसे चाट जाती। मेरा तो बुरा हाल कर दिया और मेरे लंड ने भाभी के मुँह पर अपनी पिचकारी मार दी। उनका पूरा चेहरा मेरे वीर्य से सन गया था। मैंने अपने दोनों हाथों से सारा वीर्य उनके चेहरे पर मल दिया।
“दूसरी बार में भी इतना माल? तेरा लंड है या वीर्य का टैंक?” – भाभी ने कहा।
मैं यह सुनकर हैरान हो गया, मेरी हैरानी जानकर उन्होंने बताया – “जब तू ब्लू-फिल्म देख रहा था और मेरे नाम से मूठ मार रहा था तब मैं पानी पीने के लिए रसोईघर में आई थी और तेरे लंड की धार को देख कर मेरी कामवासना की प्यास जाग गई और मैं बेडरूम में अपने कपड़ों को जान-बूझ कर अस्त-व्यस्त कर लेट गई थी। वहाँ आने के बाद अगर तू ऐसी हरकतें नहीं करता तो आज मैं ही तेरा बलात्कार कर देती।”
“तरबूज़ तलवार पर गिरे या तलवार तरबूज़ पर, कटना तरबूज़ को ही है। अब तो आज रात सचमुच में बलात्कार होगा। आज रात अगर आपसे रहम की भीख न मँगवाई तो मेरा भी नाम नन्द नहीं।” मैंने कहा।
“चल देखते हैं, कौन रहम की भीख माँगता है !” भाभी ने भी ताना सा मारा।
भाभी के ऐसा कहते ही मैंने भाभी को ज़मीन पर लिटा दिया और उनकी चूत पर टूट पड़ा, अपनी जीभ को चूत में जितना हो सकता था अन्दर डाल दिया और जीभ हिलाने लगा। चूत के गुलाबी दाने को जैसे ही मैं हल्के-हल्के काटता-चूसता, वह तड़प उठती और आआहहहहहह आआहह्ह्हहहह करने लगती।
उसने टाँगों से मेरे सिर को जकड़ लिया और टाँगों से ही सिर को चूत में दबाने लगी और बालों में हाथ फेरने लगी। मैं चूत-अमृत पीते हुए दोनों स्तनों को मसल रहा था… तभी अचानक भाभी का शरीर अकड़ने लगा उनकी चूत ज़ोरदार तरीके से झड़ने लगी।
मैंने चूत को चाटकर साफ कर दिया और जैसे ही मैं भाभी के ऊपर आने को हुआ, भाभी ने मुझे रोका और गेस्ट-रूम की ओर इशारा किया। मैं समझ गया कि वह उस कमरे में चलने को कह रही है। मैंने उन्हें गोद में लिया और चूमते हुए उस कमरे में ले आया। लाईट जलाई तो देखा, वहाँ एक सिंगल बेड था। मैंने पंखा चालू किया और उन्हें बिस्तर पर पटक दिया और उनके ऊपर आ गया। मैंने उनके होंठों को चूमते हुए अपनी टाँगों से उनकी टाँगे चौड़ी कीं।
अब मेरा लंड भाभी की चूत के ऊपर था। मैंने अपने हाथों को सीधा किया और धक्के मारने की मुद्रा में आ गया। अब मैं अपनी कमर को नीचे करता और लंड को चूत से स्पर्श करते ही ऊपर कर लेता। कुछ देर ऐसा करने के बाद भाभी बोली,”अब मत तड़पाओ, मेरी चूत में आग लग रही है, इसमें अपना लंड अब डाल दो और मेरी चूत की आग को शान्त करो, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ।
इस बार मैंने लण्ड चूत पर रखा और धीरे-धीरे नीचे होने लगा और लण्ड चूत की गहराईयों में समाने लगा। चूत बिल्कुल गीली थी, एक ही बार में लण्ड जड़ तक चूत में समा गया और हमारी झाँटे आपस में मिल गईं। अब मेरे झटके शुरु हो गए और भाभी की सिसकियाँ भी… भाभी आआआहहहहह अअआआआआहहहह करने लगी। कमरा उनकी सिसकियों से गूँज रहा था।
जब मेरा लण्ड उनकी चूत में जाता तो फच्च-फच्च और फक्क-फक्क की आवाज़ होती। मेरा लण्ड पूरा निकलता और एक ही झटके मे चूत में पूरा समा जाता। भाभी भी गाँड हिला-हिला कर मेरा पूरा साथ दे रही थी। मैंने झटकों की रफ्तार बढ़ा दी, अब तो खाट भी चरमराने लगी थी। पर मेरी गति बढ़ती जा रही थी। हम दोनों पसीने से नहा रहे थे। पंखे के चलने का कोई भी प्रभाव नहीं था।
दोनों के चेहरे एकदम लाल हो रहे थे पर हम रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। झटके अनवरत जारी थे। कभी मैं भाभी के ऊपर तो कभी भाभी मेरे ऊपर आ जाती। दोनों ही चुदाई का भरपूर मज़ा ले रहे थे। पूरे कमरे में बस कामदेव का राज था। हम दोनों एक-दूसरे की आग को बुझा रहे थे। तभी हमारे शरीर अकड़ने लगे।
दोनों झड़ने वाले थे। मैं लण्ड को बाहर निकालने वाला ही था कि भाभी ने रोक दिया और बोली – “अपना सारा माल चूत के अन्दर ही छोड़ दो।”
मैंने भी झटके चालू रखे। हम दोनों ने एक-दूसरे को भींच लिया। भाभी ने टाँगों और हाथों को मेरे शरीर पर लपेट दिया। मैंने भाभी के कंधों को कसकर पकड़ लिया और एक ज़ोरदार झटका मारा। मैं और भाभी एक ही साथ झड़े थे। भाभी की चूत मेरे वीर्य से भर गई।
वीर्य चूत से बह रहा था। मेरा मुँह अपने-आप चूत पर पहुँच गया और मैं भाभी की चूत को चाट-चाट कर साफ करने लगा।
भाभी ने भी मेरे लंड को चूस-चूस कर साफ कर दिया और हम दोनों एक-दूसरे के बगल में लेट गए, पर भाभी का हाथ मेरे लंड पर था और मैं भाभी के बालों को सहला रहा था।
भैया के आने तक मैं और भाभी पति-पत्नी की तरह रहे। मैं सुबह को दुकान का एक चक्कर लगा आता। दिन में हम नींद ले लेते और रात को…
भैया के आने के बाद भी जब भी मौक़ा मिलता, मैं उसको छोड़ता नहीं।